कम मेहनत में पहाड़ी खेती को बेहतर बनाने की नई तकनीक, पेपीनो से हल्दी और मैंडरिन तक पर हो रहा प्रयोग
सिक्किम। पहाड़ी क्षेत्रों में कम मैनपावर और सीमित संसाधनों के बीच खेती को अधिक प्रभावी बनाने के लिए नई तकनीकों और विभिन्न फसलों पर प्रयोग किए जा रहे हैं। इन प्रयोगों में पेपीनो, पेरिला, हाई करक्यूमिन कंटेंट वाली हल्दी और मैंडरिन जैसी फसलों को शामिल किया गया है। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) द्वारा आयोजित अध्ययन एवं अनुभव यात्रा के तहत सिक्किम के दौरे पर पहुंचे शिमला के मीडिया कर्मियों को विशेषज्ञों ने इन तकनीकों और खेती में किए जा रहे प्रयोगों की जानकारी दी। विशेषज्ञों के अनुसार, इन तकनीकों का उद्देश्य कम मेहनत, कम पानी और कम मैनपावर में किसानों को बेहतर उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ाना है।
बरसात के मौसम में पेपीनो की खेती को लेकर किए गए प्रयोग में सामने आया कि इस मौसम में इसका उत्पादन अपेक्षाकृत बेहतर नहीं है। हालांकि, इसकी कटिंग तैयार कर सर्दियों के मौसम में रोपण करने पर बेहतर परिणाम मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों के अनुसार, सर्दियों में लगाए जाने पर पेपीनो की ग्रोथ और उत्पादन काफी अच्छा रहने की संभावना है।
वहीं, खेत में पेरिला और हाई करक्यूमिन कंटेंट वाली हल्दी की किस्म पर भी काम किया जा रहा है। खेत के एक पूरे बेड में हल्दी की खेती की गई है। खास बात यह है कि मैंडरिन के पौधों के नीचे भी हल्दी की खेती की जा रही है। इससे एक ही क्षेत्र में अलग-अलग फसलों का उत्पादन लेने के साथ-साथ जमीन का बेहतर उपयोग किया जा रहा है।
कम मैनपावर में खेती का बेहतर प्रबंधन बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों ने बताया कि पहाड़ी क्षेत्रों में सबसे बड़ी चुनौती कम मैनपावर में खेती को बेहतर तरीके से मैनेज करना है। भारी बारिश के कारण खेतों में घास तेजी से उगती है और उसे नियंत्रित करना किसानों के लिए काफी मुश्किल होता है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए ऐसी तकनीक पर काम किया जा रहा है, जिससे कम मेहनत में पौधों को बेहतर वातावरण मिल सके।
इसके तहत पौधों के आसपास ऐसी व्यवस्था विकसित की जा रही है, जिसमें ऊपर से घास की परत दिखाई देने के बावजूद पौधे को नुकसान नहीं होता। इससे पौधे को आवश्यक पोषण मिलता रहता है और मिट्टी में नमी भी लंबे समय तक संरक्षित रहती है। यह व्यवस्था संतरे और अन्य फलदार पौधों के लिए भी उपयोगी बताई जा रही है। इससे खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलने के साथ पौधों की जड़ प्रणाली भी बेहतर विकसित होती है।
एक बार व्यवस्था, करीब पांच साल तक कम मेहनत की जरूरत
विशेषज्ञों के मुताबिक, पहाड़ी क्षेत्रों में यह सिस्टम विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। एक बार इसे स्थापित करने के बाद करीब पांच साल तक अपेक्षाकृत कम मेहनत की जरूरत पड़ सकती है। इसके साथ ड्रिप सिंचाई प्रणाली को भी जोड़ा जा सकता है। खेत में अलग-अलग स्थानों पर ड्रिप लाइन और ड्रिपर लगाकर कम पानी में प्रभावी सिंचाई की जा सकती है।
सर्दियों के मौसम में जब पानी की उपलब्धता कम होती है, उस समय ड्रिप सिंचाई काफी कारगर साबित हो सकती है। वहीं, पानी के कुंड को गुरुत्वाकर्षण आधारित प्रणाली से जोड़कर बिना अतिरिक्त ऊर्जा खर्च किए पानी खेत तक पहुंचाया जा सकता है। एक बार पाइप और ड्रिप सिस्टम स्थापित होने के बाद केवल पानी खोलकर निर्धारित समय तक सिंचाई की जा सकती है।
ऑटोमेशन से और आसान होगी सिंचाई
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस पूरी व्यवस्था को ऑटोमेशन से जोड़ा जाए तो निर्धारित समय, जैसे करीब 10 मिनट के लिए ड्रिप सिस्टम चालू कर सिंचाई पूरी की जा सकती है। इस तरह कम पानी, कम मैनपावर और कम मेहनत में पहाड़ी क्षेत्रों में फलदार पौधों और अन्य फसलों की बेहतर देखभाल संभव हो सकती है। यह तकनीक विशेष रूप से उन पहाड़ी किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है, जहां खेती के लिए श्रम की उपलब्धता सीमित है और पानी का प्रबंधन भी एक बड़ी चुनौती बना रहता है।