सिक्किम में ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयास जारी, जागरूकता बढ़ाना अब भी चुनौती
सिक्किम -
भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) द्वारा आयोजित अध्ययन एवं अनुभव यात्रा के तहत सिक्किम के दौरे पर पहुंचे शिमला के मीडिया कर्मियों को ऑर्गेनिक खेती और कृषि क्षेत्र की मौजूदा स्थिति के बारे में जानकारी दी गई। इस दौरान विशेषज्ञ ने बताया कि सिक्किम में ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के प्रयासों के बावजूद किसानों के बीच इसे बड़े स्तर पर अपनाने को लेकर जागरूकता अभी भी सीमित है। विशेषज्ञ के अनुसार, इसका एक बड़ा कारण कृषि क्षेत्र से लोगों का दूसरी गतिविधियों की ओर बढ़ता रुझान है। टैक्सी चलाने जैसे काम में भी यदि दिन में कुछ सवारियां मिल जाएं तो 3 से 4 हजार रुपये तक की आमदनी हो सकती है, जिससे लोग खेती की तुलना में दूसरे व्यवसायों को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।
विशेषज्ञ ने बताया कि सिक्किम में सरकार की ‘वन फैमिली, वन जॉब’ जैसी योजना और अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति भी कृषि पर निर्भरता को प्रभावित कर रही है। सिक्किम की प्रति व्यक्ति आय करीब 7 लाख रुपये बताई गई है, जो देश में शीर्ष स्तर पर है। ऐसे में गरीबी कम होने के कारण भी बड़ी संख्या में लोग खेती को प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान में पूरे सिक्किम में कृषि की ओर लोगों का ध्यान अपेक्षाकृत कम है।
उन्होंने बताया कि ऑर्गेनिक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए अपने स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। दूरदर्शन और आकाशवाणी जैसे माध्यमों के जरिए भी प्रचार-प्रसार किया जा रहा है, लेकिन अभी तक करीब 30 से 40 लोग ही ऐसे हैं जो इस क्षेत्र में जागरूक होकर आगे आकर काम कर रहे हैं। सवाल यह है कि जागरूकता का दायरा इतना सीमित क्यों है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।
वहीं, हिमाचल प्रदेश में सेब और अन्य फलों की खेती के दौरान कीट एवं रोगों से फसल को बचाना बड़ी चुनौती है। इस पर विशेषज्ञ ने बताया कि ऑर्गेनिक खेती में कीटों और रोगों को नियंत्रित करने के लिए कई तकनीकें पहले से विकसित हैं। इनमें फ्रूट फ्लाई ट्रैप, लाइट ट्रैप और कीटों को दूर रखने के लिए विभिन्न प्राकृतिक उपाय शामिल हैं। ऑर्गेनिक खेती में मुख्य जोर बीमारी या कीट के प्रकोप के बाद उपचार करने के बजाय पहले से ही उसकी रोकथाम पर दिया जाता है।
विशेषज्ञ ने ऑर्गेनिक खेती के मूल सिद्धांत को ‘Prevention is better than cure’ बताते हुए कहा कि फसल में बीमारी आने से पहले ही सावधानी बरतना जरूरी है। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक है क्रॉप रोटेशन। उदाहरण के तौर पर यदि किसी खेत में एक साल अदरक की खेती की गई है तो अगले साल उसी खेत में फिर अदरक नहीं लगाना चाहिए। अदरक की खेती के लिए दो या तीन साल का अंतर रखने के बाद दोबारा उसी खेत में फसल लगानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि खेत तैयार करते समय भी स्थानीय परिस्थितियों का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। सिक्किम में बारिश अधिक होती है, इसलिए खेत की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि उसमें पानी लंबे समय तक जमा न रहे। खेत में जल निकासी यानी ड्रेनेज की उचित व्यवस्था जरूरी है, क्योंकि अधिक नमी रहने पर फंगस और अन्य रोगों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन जाती हैं।
विशेषज्ञ के अनुसार, ऑर्गेनिक खेती केवल एक तकनीक नहीं बल्कि एक व्यापक अवधारणा है। बाजार की मांग और अलग-अलग देशों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इसमें लगातार शोध और नई तकनीकों का विकास करना जरूरी है। किसानों को जागरूक करने के साथ-साथ बाजार की जरूरतों के अनुरूप ऑर्गेनिक उत्पादन को बढ़ावा देना भी इस क्षेत्र की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।