सिक्किम में शिमला के मीडिया कर्मियों ने जानी कम लागत में सालभर खेती की तकनीक
पीआईबी की अध्ययन एवं अनुभव यात्रा के तहत पहुंचे मीडिया प्रतिनिधियों को विशेषज्ञों ने दी जानकारी; 100 वर्ग मीटर में 8-9 हजार रुपये की लागत से संरक्षित खेती संभव
सिक्किम। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) द्वारा आयोजित अध्ययन एवं अनुभव यात्रा के तहत सिक्किम के दौरे पर पहुंचे शिमला के मीडिया कर्मियों को कृषि क्षेत्र में हो रहे नवाचारों और जलवायु अनुकूल खेती की तकनीकों की जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने मीडिया प्रतिनिधियों को बताया कि बदलते मौसम के बीच किसानों को कम लागत में बेहतर उत्पादन उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न तकनीकों पर काम किया जा रहा है। इसी कड़ी में ऐसी संरक्षित खेती तकनीक विकसित की गई है, जिसके माध्यम से बारिश और ठंड जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद फसलों का उत्पादन जारी रखा जा सकता है।
विशेषज्ञ ने बताया कि करीब 100 वर्ग मीटर क्षेत्र में महज 8,000 से 9,000 रुपये की लागत से इस तकनीक को तैयार किया जा सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य फसल को ऊपर से होने वाली बारिश से बचाने के साथ अंदर अनुकूल वातावरण तैयार करना है। मीडिया कर्मियों को उदाहरण देते हुए बताया गया कि जुलाई में खुले क्षेत्र में जहां पत्तागोभी की फसल पूरी तरह खत्म हो गई थी, वहीं संरक्षित वातावरण में लगी पत्तागोभी की फसल बेहतर स्थिति में रही।
सालभर धनिया उत्पादन की भी संभावना
मीडिया कर्मियों ने धनिया की खेती को लेकर भी विशेषज्ञों से जानकारी हासिल की। बताया गया कि मैदानी क्षेत्रों में मई के बाद सितंबर तक धनिया मिलना मुश्किल हो जाता है, लेकिन इस तकनीक की मदद से सालभर धनिया का उत्पादन किया जा सकता है। इसके अलावा अलग-अलग cropping sequences पर भी काम किया गया है, ताकि किसानों को फसलों के सही क्रम और उससे मिलने वाले संभावित लाभ की जानकारी मिल सके।
स्थानीय फसलों में छिपी है आमदनी की बड़ी संभावना
अध्ययन एवं अनुभव यात्रा के दौरान मीडिया प्रतिनिधियों को स्थानीय और पारंपरिक फसलों को बढ़ावा देने के प्रयासों की भी जानकारी दी गई। विशेषज्ञ ने क्षेत्र की स्थानीय डल्ले चिली (Cherry Pepper) सहित अन्य प्रजातियों पर किए जा रहे अध्ययन के बारे में बताया। विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के बीच स्थानीय फसलें प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं, इसलिए इन्हें भविष्य की खेती के लिए महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है।
स्थानीय फसलों से किसानों को अच्छी आमदनी भी हो रही है। विशेषज्ञ के अनुसार जिन फसलों के inflorescences को सब्जी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, उनका बाजार भाव वर्तमान में करीब 300 से 400 रुपये प्रति किलो तक है। वहीं डल्ले चिली की कीमत भी न्यूनतम करीब 300 रुपये प्रति किलो तक जाती है।
जैविक खेती के लिए कीवी बेहतर विकल्प
मीडिया कर्मियों को जैविक खेती के लिए उपयुक्त फसलों के बारे में भी जानकारी दी गई। विशेषज्ञ ने बताया कि ऑर्गेनिक फार्मिंग में रासायनिक खाद, कीटनाशक और पेस्टीसाइड का इस्तेमाल नहीं किया जाता, इसलिए ऐसी फसलों का चयन जरूरी है, जिनमें बीमारी और कीटों का प्रकोप कम हो। इसी वजह से कीवी को क्षेत्र के लिए बेहतर विकल्प के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है।
विशेषज्ञ के अनुसार कीवी में अभी तक कोई बड़ी बीमारी या कीट की समस्या रिपोर्ट नहीं हुई है। इसकी हार्वेस्टिंग नवंबर के आसपास होती है और फल को तोड़ने के बाद कमरे के तापमान पर करीब एक महीने तक रखा जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में परिवहन चुनौती होने के बावजूद लंबी दूरी तक ले जाने के दौरान कीवी के खराब होने की संभावना कम रहती है।
एवोकाडो भी बना किसानों की पसंद, नई फसल पर बढ़ा भरोसा
कीवी के अलावा अब एवोकाडो पर भी काम किया जा रहा है। विशेषज्ञ के अनुसार एवोकाडो इस क्षेत्र के लिए एक resilient crop साबित हो रही है और इसकी फसल काफी अच्छी आ रही है। कई किसानों ने इसे अपनाना भी शुरू कर दिया है।
विशेषज्ञों ने मीडिया कर्मियों को बताया कि बदलती जलवायु के बीच किसानों के लिए ऐसी फसलों और तकनीकों की पहचान करना जरूरी है, जो कम जोखिम में बेहतर उत्पादन और आमदनी दे सकें। इसी उद्देश्य से स्थानीय फसलों के साथ नई और जलवायु अनुकूल फसलों पर अध्ययन एवं प्रयोग जारी हैं। सिक्किम दौरे के दौरान शिमला से पहुंचे मीडिया प्रतिनिधियों ने इन कृषि तकनीकों और किसानों के लिए उनकी संभावनाओं की जानकारी हासिल की।