Sunday, September 13, 2026

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बीज उत्पादन से कीवी की उन्नत किस्मों तक, वैज्ञानिकों ने समझाई खेती की तकनीक

September 12, 2026 11:28 PM

बीज उत्पादन से कीवी की उन्नत किस्मों तक, वैज्ञानिकों ने समझाई खेती की तकनीक
सिक्किम -
सिक्किम में कृषि एवं बागवानी क्षेत्र से जुड़ी संभावनाओं और आधुनिक खेती की तकनीकों को समझने के लिए भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) द्वारा आयोजित अध्ययन एवं अनुभव यात्रा के तहत शिमला से आए मीडिया कर्मियों को वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण जानकारी दी। वैज्ञानिकों ने बीज उत्पादन से लेकर नई किस्मों के विकास, बीज की गुणवत्ता बनाए रखने और कीवी की उन्नत किस्मों की खेती तक विभिन्न पहलुओं के बारे में विस्तार से बताया। इस दौरान वैज्ञानिकों ने बताया कि किसी नई किस्म को विकसित करने के बाद संस्थान किसानों को बड़ी मात्रा में बीज उपलब्ध नहीं करवाता, बल्कि शुरुआत में करीब आधा किलो या एक किलो तक सीड दिया जाता है। इसके बाद संबंधित राज्य की जिम्मेदारी होती है कि वह उससे ब्रीडर सीड तैयार करे और आगे अन्य किसानों को वितरित करे। इस पूरी प्रक्रिया में बीज की गुणवत्ता और किस्म की शुद्धता बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार जब कोई नई वैरायटी रिलीज की जाती है तो उससे न्यूक्लियस सीड तैयार किया जाता है, जो आगे बीज उत्पादन की आधार सामग्री बनता है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि बीज उत्पादन की पूरी प्रक्रिया में गुणवत्ता नियंत्रण का विशेष महत्व है। नई किस्म को किसानों तक पहुंचाने से पहले उसकी आनुवंशिक शुद्धता और उसके मूल गुणों को बनाए रखना आवश्यक होता है। संस्थान द्वारा उपलब्ध करवाए गए सीमित मात्रा के सीड से राज्य स्तर पर आगे ब्रीडर सीड तैयार किया जाता है और इसी प्रक्रिया के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता बढ़ाई जाती है। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि किसी भी उन्नत किस्म का लाभ किसानों तक पहुंचाने के लिए केवल नई वैरायटी विकसित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके बीज उत्पादन की वैज्ञानिक प्रक्रिया और किस्म की शुद्धता को भी लगातार बनाए रखना जरूरी है।
कीवी की खेती को लेकर वैज्ञानिकों ने बताया कि यह पहाड़ी क्षेत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण फल फसल है और हिमाचल प्रदेश सहित अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में भी इसकी खेती की जा रही है। कीवी की अलग-अलग ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए अलग किस्में बेहतर परिणाम देती हैं। हाई अल्टीट्यूड यानी अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए हेवर्ड किस्म अच्छी मानी जाती है, जबकि मिड और लो अल्टीट्यूड क्षेत्रों में एलिसन और डोरनो जैसी किस्मों का इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिकों ने बताया कि किसी क्षेत्र में कीवी की खेती शुरू करने से पहले वहां की ऊंचाई और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप किस्म का चयन करना बेहद महत्वपूर्ण है। सही किस्म का चुनाव उत्पादन और फल की गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करता है।
कीवी की खेती में केवल फीमेल पौधों का होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बेहतर फल उत्पादन के लिए उचित परागण की भी आवश्यकता होती है। वैज्ञानिकों ने बताया कि कीवी की खेती में पोलिनाइजर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एलिसन, डोरनो और हेवर्ड महिला यानी फीमेल किस्में हैं, जबकि मतुआ किस्म का इस्तेमाल मेल पोलिनाइजर के तौर पर किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार सही फीमेल किस्म के साथ उपयुक्त मेल पोलिनाइजर लगाने से परागण बेहतर तरीके से होता है और फल उत्पादन को बढ़ाने में मदद मिलती है। इसलिए कीवी का बाग लगाने के दौरान किसानों को केवल फल देने वाली किस्म का चयन करने के बजाय पोलिनेशन की पूरी व्यवस्था को ध्यान में रखना चाहिए।
इस दौरान सिक्किम में कीवी की खेती और यहां इस्तेमाल की जा रही किस्मों को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई। वैज्ञानिकों ने बताया कि सिक्किम की अपनी कोई प्रमुख स्थानीय कीवी किस्म नहीं है। वर्तमान में यहां प्रचलित कीवी की किस्में विदेशों से लाई गई हैं, जिनका मूल स्रोत न्यूजीलैंड बताया गया। इन किस्मों को पहले भारत में कुछ प्रमुख संस्थानों में संरक्षित एवं परीक्षण के लिए रखा गया था, जिनमें एनपीजीआर भवाली और हिमाचल प्रदेश भी शामिल रहे। हालांकि बाद में अन्य क्षेत्रों ने इन किस्मों की उपयोगिता को समझते हुए इन्हें बड़े स्तर पर अपनाया। पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु और परिस्थितियों के अनुरूप इन किस्मों ने बागवानी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वैज्ञानिकों ने फल फसलों में किस्मों की शुद्धता को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अधिकांश फल फसलें क्रॉस-पॉलिनेटेड होती हैं। ऐसे में यदि इनका उत्पादन बीज के माध्यम से किया जाता है तो हर पौधे में आनुवंशिक बदलाव आने की संभावना रहती है। मेंडल के नियम के अनुसार अगली पीढ़ी में गुण अलग-अलग तरीके से विभाजित होते हैं। यही कारण है कि बीज से तैयार होने वाला हर पौधा अपने आप में अलग विशेषताओं वाला हो सकता है। यानी एक ही पौधे से प्राप्त बीजों से तैयार होने वाले पौधों में भी आकार, गुणवत्ता, उत्पादन क्षमता और अन्य गुणों में अंतर देखने को मिल सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार किसी खास किस्म के गुणों और उसकी शुद्धता को बनाए रखने के लिए वेजिटेटिव प्रोपेगेशन यानी वानस्पतिक प्रवर्धन बेहद महत्वपूर्ण है। इस प्रक्रिया के माध्यम से मूल पौधे के समान गुणों वाली पौध तैयार की जा सकती है। वहीं बीज से पौधे तैयार करने पर किस्म की शुद्धता बनाए रखना कठिन होता है। यही वजह है कि बागवानी फसलों की उन्नत और शुद्ध किस्मों को किसानों तक पहुंचाने में वानस्पतिक प्रवर्धन की तकनीक का विशेष महत्व है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि शोध से जुड़ी ये बातें केवल किताबी जानकारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका परीक्षण और परिणाम खेतों में भी देखे जा सकते हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से विकसित किस्मों और तकनीकों को जब खेतों में अपनाया जाता है तो उनके वास्तविक परिणाम सामने आते हैं। इस दौरान शिमला से पहुंचे मीडिया कर्मियों ने वैज्ञानिकों से खेती, बीज उत्पादन, कीवी की किस्मों, परागण और पौधों की शुद्धता से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी हासिल की। अध्ययन एवं अनुभव यात्रा का उद्देश्य भी कृषि और बागवानी सहित विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे कार्यों की जमीनी जानकारी मीडिया प्रतिनिधियों तक पहुंचाना है, ताकि इन प्रयासों और तकनीकों को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाया जा सके।

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